‘Meri Kahaani’ a story of Grit and Determination by Mohd. Arif

मेरी कहानी
जब कोई इन्सान अपनी ज़िन्दगी के उस पड़ाव पर आता है जहां उसका हर प्रयास उसको नीचे कि ओर ले जाता है तब वो मानसिक और शारीरिक रूप से कमज़ोर पड़ने लगता हैं और वो खुद को एक बेजान चीज़ समझने लगता है।ज़िन्दगी के सारे रास्ते उसे बन्द लगने लगतें है ऐसी परिस्थितियाँ उस इन्सान मे दो तरह कि ज़िद पैदा करती है या तो वो मुश्किलो का सामना करके एक ऊँचाई हासिल करें या हिम्मत हार के अपनी हस्ती को गवा दें, हमारी इस असली कहानी के हीरो ने पहला रास्ता अपनातें हुये मुश्किलों का सामना किया और अपने आपको उपर उठाने की कोशिश में लगा रहा। हर माँ बाप यही चाहते है कि उनके बच्चे हमेशा सफल हो और जिन्दगी में कभी दुखी ना हो। बच्चों मे ही उनकी खुशी छुपी होती है। जिसके लिये वो अपनी हर तकलीफ खुशी-खुशी झेल जाते है। ऐसे ही एक परिवार कि कहानी है, जो मैं बताना चाहता हूँ । पिता जो परिवार का मुखिया हैं जीवन से हार चुका है और परिवार के लिये कुछ नही कर सकता। जो भी काम वो करता है उसमे वो असफल ही रहता है जिसकी वजह से बच्चों की अच्छी परवरिश तो दूर की बात है दो समय का खाना भी पूरा नही हो पाता। कई बार ऐसा हुआ कि माँ ने बच्चो कों बहलाने के लिये झूठ बोला कि अभी खाना बनाती हूँ और बच्चें ये सोचते-सोचते सो गये कि खाना बन रहा हैं, ये सिलसिला कई दिनो तक चलता रहा।
पत्थर उबालती रही एक माँ तमाम रात! बच्चें फरेब खाके चटाई पर सो गये!!
तभी माँ ने कुछ घरों से कपडे़ सिलने का काम उठाया और जो पैसे मिलतेे उससे वो घर चलाती। इसी आर्थिक तंगी के चलते बच्चों कि अच्छी पढ़ाई लिखाई ना हो पाई। उन बच्चों मे एक बच्चा ऐसा था जो खामोशी से सब देखता और दिल ही दिल में एक प्रण करता कि एक दिन मेरा भी आयेगा और मै सब ठीक कर दूंगा उसका ये ज़ज्बा उसकी आँखें बयाँ करती और उसकी भाषा केवल उसकी माँ समझती । फिर एक रात वो हुआ जब उस बेटे ने अपने प्रण को एक दिशा दे दी जब उसने अपने हारे हुये पिता को माँ से बात करतें सुना कि ज़िन्दगी मे आगे क्या होगा, मै अपने बच्चों के लिए कुछ नही कर पाया।पता नही उस पिता की इस छोटी सी बात मे क्या था कि आने वाली सुबह उस बेटे के लिये बिल्कुल नयी थी, उसने बिना बताये अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ी और ज़िन्दगी के एक नये सफर पर चल पड़ा । उस सफर में उसको बहुत कुछ करना था। कुछ ऐसा कि उसके परिवार के सारे दुखः कम हो जाये । उसकी ज़िन्दगी का पहला काम लोगो के घर घर जा कर दूध बेचना, रात को स्टेशन पर पानी कि बोतल बेचना, सुबह कड़ी धूप में ग्राहकों को कोल्ड ड्रिंक्स बेचना था, जो पैसे मिलते वो अपनी माँ को देता और एक वादा लेता कि पिता को ना बताना वरना वो मुझे काम नही करने देंगे । जब घर का खर्च थोड़ा आसानी से चलने लगा तो उसने साथ ही कुछ हुनर सीखने का सोचा ताकि इस थोड़ी सी आसान चलने वाली ज़िन्दगी को गति दे पायें और कभी पीछे मुड़ कर ना देखना पडे़। रातों को काम करने के साथ-साथ उसने कम्प्यूटर की शिक्षा ली और किसी कि मद्द लिये बगैर वो अपने घर को भी देखता और अपने काम को भी ध्यान मे रखता। फिर वक्त बदलता गया और वो भी अपने ज़ज्बे के साथ आगे बढ़ता गया। लोग जुड़ते गये और कारवां बनता चला गया। उसके इरादों की पाक रौशनी मे उसके छोटे भाई व बहन अपनी शिक्षा पूरी करने लगे और घर आसानी से चनले लग गया। अब घर मे सब खुशी से रहते है। अब माँ को कपड़े नही सिलने पड़ते किसी के। पूरा परिवार साथ-साथ रहता हैं ।ज़िन्दगी मे ऊँच नीच तो सभी की आती है पर अब उस घर में कोई भी हार नही मानता, सब उसका सामना करते है।
ये कहानी जो मैनें आपको सुनाई वो किसी और की नही मेरी है

अंधेरे अब भी आतें हैं मुश्किले साथ लातें हैं ! मगर अब हार कर बैठूँ इरादे है नही ऐसे
है रौशन मंज़िले मेरी इरादे भी मुकद्दस हैं । वो देखों साथ देने को मेरे अपने भी आतें है!!

मोहम्मद आरिफ