A beautiful write up by Kamal Hussain

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व्यथा
नवंबर का खुशगवार मौसम, ठंडक की खुनकी, हर तरफ एक बहार सी हैं। बस इस खूबसूरत मंजर के बीच अगर कोई उदास है तो वो मैं हॅू। ज़िन्दगी में मैने क्या पाया क्या खोया उसका कभी हिसाब नही किया ! दूसरो की नज़र मे मैं एक कामयाब इन्सान हूॅ, एक कामयाब पिता! कामयाब पति! कामयाब वैवाहिक जीवन! फिर इतनी कामयाबियों के बीच ऐसा क्या है जो मुझे उदास करता है! मेरा दामन इतना खाली क्यूॅ है? सभी बच्चे अपने-अपने, घरों मे व्यस्त पुत्राीं की शादी, पुत्रों की शानदार नौकरी, सुखी वैवाहिक जीवन! सभी जिम्मेदारियों से मुक्त । क्या है ऐसा जिसे मैनें नही पाया। बस अपने लिये कभी वक्त ही नही निकाल पाया कि अपनी खुशी को कभी सर्वोपीर जाना ही नही जिन्दगी की जद्दोहद में खोए पति पत्नी सोचते थे कि सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर एक दूसरे को वक्त देंगें। खूब घूमेंगे। विश्वभ्रमण का बहुत शौक था मधुरिमा को। मैने इसके लिए एक एकाउंट खोला था जिसमें समय-समय पर पैसा डलवाता था जिसका पता मधुरिमा को भी नही था । क्योकि बच्चों की महंगी शिक्षा कभी कुछ बचत करने की इजाज़त ही नही देती थी।
मगर नही जानता था कि मधुरिमा को मुझसे ज्यादा जल्दी है इस दुनिया से जाने की । उसे ये भी नही बता पाया कि मेरे पास तुम्हारे विश्वभ्रमण की रकम एकत्रा हो गयी हैं ! कुछ दिन और रूक जाओं । लगा वक्त रूक गया, सब छिन गया । सारी रौनक मेरे घर की वो अपने साथ ही समेट के ले गयी! सारी खुशियाॅ कही खो गयी! आज सब याद आ रहा है! घर का कोना-कोना साक्षी है उसके प्यार और स्नेह का! एकदम एहसास हुआ कि मै रो रहा हूॅ! मधुरिमा की याद में सारा घर घूम आया हूॅ! घर, लाॅन प्रत्येक कोना जैसे उसे ही पुकार रहा है। पुत्रा-पुत्राी का प्यार बस हफ्ते मे एक बार तक सिमट कर रह गया है। एक बार आना, नौकरो को हिदायत देना। मेरी दवाईयाॅ लाकर रख देना! मेरे पूरे हफ्ते के खाने-पीने का ख्याल रखना या फिर जरूरत पड़ने पर मुझे याद करना और बाकी के छः दिन अकेलापन! पूरा भांय-भांय करता घर! मै कभी बच्चों के साथ जाकर रहना चाहा तो लगा कि जैसे तीसरे ग्रह का प्राणी हूॅ उनकी दिनचर्या का बाधक! चाहता हूॅ! कि वो बच्चो के साथ हफ्ते मे एक बार मेरे पास आकर रहें! पूरा घर चहक उठें। और मै इस जिन्दगी की हरारत मे बाकी के छः दिन काट दूॅ, उस सातवें दिन के इंतज़ार में! मुझे ये सजा सजाया घर अच्छा नही लगता।

कोई आये मेरे संसार मे जिन्दगी का एहसास हो!
बहुत जी लिये सन्नाटों मे, कुछ सांसो की आवाज़ हो!!

कमल हुसैन